
एक चाहत होती है… अपनों के साथ जीने की,
वरना पता तो हमें भी है… कि मरना अकेले ही है,
मित्रता एवं रिश्तेदारी ‘सम्मान’ की नही
”भाव” की भूखी होती है…
बशर्ते लगाव दिल से होना चाहिए दिमाग से नही…
Ek Chahat Hoti Hai… Apno Ke Sath Jeene Ki,
Warna Pata To Hamein Bhi Hai Ki Marna Akele He Hai,
Mitrata aur Rishtedari Samman Ki Nahi Bhav Ki Bhuki Hoti Hai!
Basarte Lagaw Dil Se Hona Chahiye!!

धीरे-धीरे अब रिश्ते बदलने लगे हैं,
अपना कहने वालों के दिलों में अब,
तेरे-मेरे के भाव भरने लगे हैं,
जुबान पे मिठास और दिलों में कड़वाहट रखते हैं,
रिश्तों को अपनेपन के भाव से नहीं पैसे से परखते हैं,
खून के रिश्तों की गरीबी-अमीरी के तराजू में तोलते हैं,
पैसों से कमजोर के लिए,
बेगानापन और पैसे वालों के लिए बातों में शहद घोलते हैं!

जब हम निस्वार्थ भाव से
दूसरों की भलाई करते हैं तो
हमारी सभी बुराइयां ठीक वैसे ही
दूर हो जाती हैं, जैसे बहते हुए पानी में
कचरा किनारे पर आ जाता है!
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