
शमशान की राख देख के मन में एक ख्याल आया…
सिर्फ राख होने के लिए
इंसान जिंदगी भर दूसरे से कितना जलता है
Samsaan Ki Rakh Dekh Ke
Man Main Ek Khayal Aaya!!
Sirf Rakh Hone Ke Liye
Insaan Zindagi Bhar
Dusre Se Kitna Jalta Hai!

मृत्यु अटल और निश्चित है,
परंतु कब, कहाँ और कैसे?
यह निश्चित नहीं है,
अत: अपना प्रत्येक समय, शक्ति और
वस्तुओं का सेवा में सदुपयोग करते रहना चाहिए!

मृत्यु के बाद यही है जीवन का कड़वा सच
पत्नी :- मकान तक,
समाज :- शमशान तक,
पुत्र :- अग्निदान तक,
सिर्फ आपके कर्म भगवान तक!
मनुष्य जन्म लेता है तो,
उसके पास सांसे तो होती हैं,
पर कोई नाम नहीं होता,
और जब मनुष्य की मृत्यु होती है,
तो उसके पास नाम तो होता है,
पर सांसे नहीं होती,
इसी सांस और नाम के बीज की
यात्रा को ”जीवन” कहते हैं!
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