
अपील
इन्हें गली का आवारा कुत्ता कह के दुत्कारिये नहीं। कभी इनकी भी पीड़ा समझने की कोशिश करियेगा। जब ये रात को रोते है तो हो सकता है इन्हें सारे दिन में रोटी का एक निवाला भी न मिला हो और ये भूख से बेहाल हों।
अपने घर का बचा-खुचा जूठा खाना कूडे के ढेर पे फेंकने के बजाय अपने गेट के बाहर कहीं रख दें। क्योंकि इन यतीमों का आपके सिवा कोई नहीं है।
गली-कूचों में जीवन हमारा
हम दुम हिलाकर जीते हैं,
श्वानधर्म है नस-नस में
हड्डी फेंकने वाले को चाहते हैं।
माई-बाप हड्डी फेंकने वाला
उसकी चौखट पर समर्पण हमारा,
वो जिधर कहे, उधर ही भागें
मन उसी के लिए वफादार बेचारा।
वो बैठने कहे तो बैठें हम
वो उठ कहे तो उठते हैं,
उसकी गालियां भी सिर झुकाकर
विन बोले सब कुछ सहते हैं।
अगर फेर दे वो हाथ सिर पर
तो उसके जूठन तक को चाटें,
कोई उसपे उठाए उंगली
तो भोंककर करते हम सन्नाटे।
उसके लिए पागल होकर
गुस्से में गुरति जेल भी जाते,
उसकी खातिर अंधेरों में
धीरे-धीरे खुद को मिटाते।
क्योंकि… हम आबाटा हम कुत्ते
हम हमारा श्वानधर्म निभाते…
– ललित चंद्रकांत सुतार