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ऐसी वाणी बोलिए, मन का आप खोये!
औरन को शीतल करे, अपहुं शीतल होए!!
अर्थात् :- इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए, जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगें। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है!

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।
पथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।।
कबीर कहते हैं, कि सिर्फ बड़े होने से कुछ नहीं होता। उदाहरण के लिए खूजर का पेड़, जो इतना बड़ा होता है पर ना तो किसी यात्री को धूप के समय छाया दे सकता है, ना ही उसके फल कोई आसानी से तोड़ के अपनी भूख मिटा सकता है।

तिनका कबहूँ न निंदिये, जो पावन तर होए ।
कभू उड़ी अँखियाँ परे, तो पीर घनेरी होए ।।
कबीर कहते हैं कि किसी तिनके को पावों के नीचे नहीं रौंदना चाहिए। अर्थात किसी दुर्बल, असहाय के ऊपर अत्याचार नहीं करना चाहिए क्योंकि जब दुर्बल उठ के वार करेगा तो बहुत पीड़ा होगी, जैसे तिनका यदि आँख में उड़ के चला जाए तो बहुत व्यथा होती है।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ।।
मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तो तू मुझे पैरों के नीचे रोंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब तू मेरे नीचे होगा और मैं तेरे ऊपर होउगी। अर्थात् मृत्यु के बाद सब मिट्टी के नीचे ही होते हैं।

साँई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय ।।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भुखा जाय ।।
कबीर कहतें हैं, कि हे भगवान् मुझे ज्यादा नहीं चाहिए, बस इतना दीजिये, जिस में परिवार का भरण-पोषण हो जाए और यदि कोई अतिथि आये तो उसका सत्कार भी कर सकूँ।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ।।
ये उन लोगों के ऊपर कटाक्षा है जो धर्मभीरू होते हैं, कबीर कहते हैं कि माला फेरने से कुछ नहीं होता, धर्मभीरूता छोड़ के अपने मन को बदलो।
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